भीख मांग कर गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूलों को पैसा देता है ये शख्स, कभी आखें खराब होने से छूट गई थी पढ़ाई

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हर इंसान का सपना अपनी जिंदगी में कुछ कर दिखाने का होता है, लेकिन कई बार सामने आई परेशानियां उनके इस सपने को तोड़ के रख देते हैं। ऐसे में कई बार यह लोग अपने सपने टूट जाने के बाद दूसरों की आंखों से अपने सपनों को साकार करने की ख्वाहिश रखते हैं। कुछ ऐसी ही तस्वीर उदयपुर जिले के वल्लभनगर के सामने आई है, जहां रहने वाले 53 साल के दृष्टिहीन मदन गोपाल मेनारिया को साल 1980 में टाइफाइड हो गया था, जिसके चलते वह अंधे हो गए थे।

Image Source- Dainik Bhaskar

रोशनी चले जाने से छूट गई थी पढ़ाई

इस बीमारी के चलते मदन गोपाल की आंखों की रोशनी पूरी तरह से चली गई थी। मदन गोपाल पढ़ाई में काफी होशियार थे। ऐसे में जब आंखों की रोशनी चली गई तो उनका अपनी जिंदगी में कुछ कर दिखाने का सपना अधूरा रह गया। इस समय वह नौवीं की कक्षा के छात्र थे। अपने सपने अधूरे रह गए और आंखों की रोशनी चली गई। तो हालात से मजबूर होकर भीख मांग कर अपना गुजारा करना पड़ा। आज लोग उन्हें हरिओम नाम से बुलाते है।

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बच्चों की शिक्षा का रखते हैं ध्यान

पढ़ने की इच्छा अधूरी रहने का मलाल उन्हें आज भी होता है। ऐसे में उन्होंने ठान लिया कि वह अपने क्षेत्र के किसी भी बच्चे को पढ़ाई से वंचित नहीं होने देंगे। चाहे उनकी जिंदगी में सुविधाओं का अभाव हो, लेकिन वह उन बच्चों की जिंदगी में शिक्षा का अभाव नहीं होने देंगे। अपनी इसी सोच के साथ वह मंदिरों के बाहर भीख मांग कर जुटाए गए पैसों से गरीब बच्चों की फीस के तौर पर स्कूलों में पैसा देते हैं।

स्कूलों में कई तरीकों से की मदद

मदन गोपाल को भीख मांगते हुए 30 साल हो गए हैं। अब तक कई सरकारी स्कूलों में कमरों का निर्माण, पानी की टंकी बनवाने से लेकर 10 लाख के विकास कार्य वह अपने इन्हीं भीख मांगे हुए पैसों से करवा चुके हैं। मदन गोपाल बच्चों की स्टेशनरी का खर्चा भी उठाते हैं। वह भीख में मिली हुई राशि से अपने खाने-पीने का खर्च निकालने के साथ-साथ स्कूलो में यह पैसा दान करते हैं। उनकी इस सोच को जानते हुए मंदिरों के दर्शन करने आये कई श्रद्धालु उन्हें पैसे दान में दे जाते हैं।

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आज भी याद आता है परिवार

वहीं अपने बचपन के बारे में हरिओम कई बार बताते हुए से कह चुके हैं कि पिता छगनलाल मेनारिया 20 साल पहले बैंक अकाउटेंट के पद से रिटायर हुए है और मां करणी के तौर पर काम करती थी। भाई एक फोटोग्राफर है। हरिओम कहते हैं कि मैं भले ही अपनी आंखों की रोशनी चले जाने के चलते नहीं पढ़ सका, लेकिन अपने क्षेत्र के किसी भी बच्चे की पढ़ाई को अधूरा नहीं रहने दूंगा।

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