चीन के बाद अब जापान बढ़ा सकता है चिंता, भारत पर मंडरा खतरनाक बीमारी का खतरा

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चीन के वुहान प्रांत से निकले कोरोना वायरस से अब तक दुनिया के 200 से ज्यादा देश जूझ रहे हैं. शायद ही कोई देश या प्रांत है, जो इस खतरनाक वायरस की चपेट में आने से बचा हो. अब तक करीब 13.50 लाख लोगों की जान जा चुकी है. अब जापान (Japan) एक ऐसा घातक कदम उठाने की तैयारी में है, जिससे न सिर्फ भारत बल्कि पूरे एशिया की चिंता बढ़ सकती है.

बता दें कि जापान ने फैसला किया है कि साल 2022 से फुकुशिमा स्थित खस्ताहाल परमाणु संयंत्र से रेडियोधर्मी दूषित जल को समुद्र के पानी में छोड़ा जाएगा. जापान के इस फैसले से भारत में चिंताएं बढ़ गईं हैं. विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि इससे एक गलत चलन की शुरुआत होगी और दुनियाभर के विभिन्न भागों के तटीय क्षेत्रों में जलीय जीवों तथा मानव जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.

दूषित पानी में कई खतरनाक तत्व मौजूद

इस दूषित जल में सीजियम, ट्रिटियम, कोबाल्ट और कार्बन-12 जैसे रेडियोधर्मी समस्थानिक मिले होंगे. इनका प्रभाव खत्म होने में 12 से 30 साल तक का समय लग सकता है. इसकी चपेट में आने वाली कोई भी चीज लगभग तुरंत ही बर्बाद हो जाएगी. इसके अलावा इससे मत्स्य उद्योग संबंधी अर्थव्यवस्था भी संकट में घिर जाएगी.

कौन सी बीमारी का है खतरा

साथ ही यह कैंसर समेत कई बीमारियां भी पैदा कर सकता है. रक्षा अनुसंधान विकास संगठन (डीआरडीओ) के स्वास्थ्य विज्ञान महानिदेशक ए के सिंह ने कहा, ‘ऐसा पहली बार होगा जब इतनी भारी मात्रा में समुद्र में रेडियोधर्मी जल छोड़ा जाएगा. इससे एक गलत चलन शुरू हो जाएगा और अन्य भी ऐसा करने लगेंगे. पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं वाजिब हैं. लिहाजा दुनियाभर में वैकल्पिक प्रबंधों पर बहस छिड़ सकती है।’

भूकंप से क्या हुआ था

आपको बात दें कि 11 मार्च 2011 को जापान के उत्तर-पूर्वी तट पर 9.0 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके बाद उठीं 15 मीटर ऊंची सुनामी लहरों के चलते 5,306 मेगावाट के फुकुशिमा परमाणु संयंत्र को नुकसान पहुंचा था. यह 1986 में चेर्नोबिल की घटना के बाद दूसरी सबसे बड़ी परमाणु आपदा थी. इस घटना के बाद रिएक्टरों से निकले 12 लाख टन रेडियोधर्मी दूषित जल को 1,000 टैंकों में फुकुशिमा संयंत्र के निकट एक बड़े क्षेत्र में रोक दिया गया था. जापान सरकार ने 2022 से रेडियोधर्मी दूषित जल को समुद्र में छोड़ने का फैसला किया है. दूषित जल को छोड़ने का फैसला वर्षों की बहस के बाद 16 अक्तूबर 2020 को लिया गया था.

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