बिहार: IIM गोल्ड मैडिलिस्ट बेचता है सब्जियां…22 रुपए से शुरू किया था सफ़र, आज टर्नओवर 5 करोड़ पार

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कहते है कोई काम छोटा नहीं होता ऐसे ही एक शख्स ने लोगों को बताया कि काम भले ही छोटा हो, लेकिन सच्ची लगन और इरादा पक्का हो तो छोटे काम को भी बड़ा बनाया जा सकता है. दरअसल, बिहार के नालंदा जिले के गांव मोहम्मदपुर के रहने वाले कौशलेंद्र ने यह साबित कर दिखाया है कि आप अपनी सूझबूझ और मेहनत से कोई भी काम कर सकते हैं.

बात दें, कौशलेंद्र बिहार के एक छोटे से गांव के रहने वाले हैं. वह पढ़ाई में बचपन से ही बहुत होशियार रहे हैं. कौशलेंद्र मज़ाक में खुद को सब्सिडी का प्रोडक्ट कहते हैं क्यूंकि, वह सरकारी आदमी है. उनका मानना है कि वह सरकारी संस्थानों में ही पढ़े हैं इसीलिए वह सरकारी आदमी हुए.

उनकी शिक्षा सरकारी संस्था जवाहर नवोदय विद्यालय से हुई थी और 12वीं उन्होंने साइंस कॉलेज पटना से की, गुजरात के इंडियन कॉउंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चर रिसर्च से एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग की और इसके बाद आई आई एम अहमदाबाद से एमबीए पूरी की. कौशलेंद्र की माता स्कूल की टीचर हैं तो पिता कॉलेज में लैब इंचार्ज.

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कौशलेंद्र के तीन भाई बहनों में वह सबसे छोटे हैं. जहां आज की इस भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में कम्पटीशन बढ़ गया है, वहीं कौशलेंद्र ने सब्ज़ी बेचने का काम शुरू किया. उन्होंने वो नौकरी नहीं की जो उन्हें बड़े आराम से मिल सकती थी. कौशलेंद्र के लिए यह एक चुनौती थी.

सब्जी बेचने के इस काम में लोगों ने उनका मज़ाक भी उड़ाया. सबके लिए यह हैरानी की बात थी कि आई आई एम अहमदाबाद से गोल्ड मेडल जीत कर पास आउट हुए कौशलेन्द्र ने आखिर सब्जी बेचने का काम ही क्यों चुना?

लोगों के मज़ाक उड़ाने के बावजूद कौशलेंद्र को किसी की बातों का बुरा नहीं लगा और अपने इस काम में आगे बढ़ते चले गए. जो व्यक्ति लाखों करोड़ों कमा सकता था उसने अपने सब्जी के काम में पहले ही दिन मात्र 22 रूपए कमाए. बात दें, कौशलेंद्र ने अपना यह काम पटना में शुरू किया था और मात्र 22 रूपए कमाए थे.

मगर 2016-17 तक उनका टर्न ओवर 5 करोड़ से भी पार जा चूका था और आज भी बढ़ता ही जा रहा है.

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कौशलेंद्र ने सब्जियों का मानो एक ब्रांड खड़ा कर दिया हो, ऐसा ब्रांड जो पटना से शुरू होते-होते आज पूरे देश तक फैलता जा रहा है. हालांकि, कौशलेंद्र ने अपने भाई के साथ मिलकर 2008 में सब्जियों के ब्रांड समृद्धि तथा कौशल्या फाउंडेशन के नाम से एक संस्था की स्थापना भी की थी, जहां सब्जियों को छाटने के बाद उनकी पैकिंग तथा बारकोडिंग की गई और इन सब्जियों को समृद्धि ब्रांड के नाम से ही बेचा गया.

कौशलेंद्र ने बताया कि उसने समृद्धि ब्रांड को किसानों और आम लोगों के बीच से बिचौलियों को हटाने के लिए तैयार किया जिससे सभी सब्जियों को सही दाम पर किसानों से लिया जा सकें और सही दाम में बाज़ारो में बेचा जाए मगर किसान उनकी बैठक में 5 मिनट से ज़्यादा नहीं बैठ पाए, जिससे कौशलेंद्र को दुःख तो हुआ पर उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने ठेले पर सब्जियों को बेचना शुरू किया. बता दें, यह कोई आम ठेला नहीं था बल्कि, इसे ग्रीन कार्ड कहा जाता है जो कि फाइबर से बना होता है.

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इस ठेले में 5 से 6 दिन तक सब्जियां ताज़ी रहती हैं और इसमें इलेक्ट्रॉनिक से बना तराज़ू भी होता है जिसने ग्राहकों को अपनी और आकर्षित किया. शहर भर में ऐसे 50 ठेले चलने लगे. शुरूआती दौर में इन ठेलो से शॉपिंग मॉल के लिए ही सब्जियां खरीदी जाती थी, मगर धीरे-धीरे इन ठेलों से आम लोग भी सब्जियां खरीदने लगे. जब ऐसे ठेलो की लोकप्रियता बढ़ती चली गई तो कौशलेंद्र ने कमाई का एक और तरीका सोच निकला.

उन्होंने इन ठेलो का विज्ञापन देना भी शुरू किया जिससे कौशलेंद्र को अच्छी खासी कमाई होने लगी और देखते ही देखते ठेलो की लागत उन्हें वापस मिल गई. कौशलेंद्र ने बताया कि अच्छी पढ़ाई करने के बाद आसान होता है नौकरी करना मगर बिहार में गरीब जनता की समस्या को देखते हुए वह अपने साथ-साथ उन लोगों का भविष्य भी सुधारना चाहते थे जिन्हे रोज़गार के लिए अपने घरों से दूर जाना पड़ता है.

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बिहारी मज़दूरों के बढ़ते पलायन को देखते हुए उन्होंने इस काम को करने का फैसला लिया था. वह जानते थे उनको कई मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है मगर उन्होंने हार नहीं मानी. आज कौशलेंद्र के कारण ही 22 हज़ार से भी ज़्यादा किसानों को उनकी फसल का सही दाम मिल रहा है और उन्ही के कारण लोग घर पर रहकर रोज़गार कर रहे हैं.

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