सपा के ‘पितामह’ मुलायम ने जब भाई के लिए दे दिया था गुरु को दांव, पढ़ें किस्सा

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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादवका जन्म इटावा जिले के सैफई गांव में हुआ था। किसान परिवार में जन्मे मुलायम के पांच भाई-बहन हैं। पिता सुधर सिंह यादव उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे लेकिन पहलवानी में अपने राजनीतिक गुरु नत्थू सिंह को मैनपुरी में एक कुश्ती-प्रतियोगिता में प्रभावित करने के बाद उन्होंने नत्थू सिंह के ही विधानसभा क्षेत्र जसवन्त नगर से राजनीतिक सफर शुरू किया था।

राजनीति में आने से पहले मुलायम कुछ दिनों तक इन्टर कॉलेज में टीचिंग भी कर चुके हैं। मुलायम ने यूपी के आगरा विवि से एमए और जैन इंटर कॉलेज से बीटीसी किया था। सियासत के अखाड़े में आने से पहले वह पहलवान थे।

भाई के लिए दे दिया था गुरु को दांव

Image Source; Social Media

समाजबादी पार्टी के पितामह कहे जाने वाले मुलायम सिंह यादव ने कभी अपने राजनीतिक गुरु और पूर्व पीएम चंद्रशेखर सिंह को दांव दे दिया था। ऐसा उन्होंने अपने भाई रामगोपाल यादव के लिए किया था। यह किस्सा साल 1990 के बाद का है।

साल 1990 में उन्होंने चंद्रशेखर के साथ मिलकर समाजवादी जनता पार्टी बनाई। चंद्रशेखर इसके अध्यक्ष थे। मुलायम इसमें उनके साथ थे। केंद्र में तब कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर पीएम बने, जबकि यूपी में कांग्रेस के सपोर्ट से मुलायम सीएम बने रहे।

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लेकिन साल 1991 में दोबारा चुनाव हुए, लेकिन इस बार सियासी पास पलट चुके थे और राज्य की जनता ने बहुमत देकर बीजेपी को चुना और बीजेपी यूपी की सत्ता में आ गई। कल्याण सिंह तब उत्तर प्रदेश के सीएम बने।

इसी बीच, चंद्रशेखर और मुलायम में टकराव बढ़ा। दरअसल, यूपी विस में 24 विधायक थे। पर राज्यसभा चुनाव में एक उम्मीदवाद भेजा जाना था। चंद्रशेखर अपनी पसंद के कैंडिडेट को वहां चाहते थे। मगर मुलायम ने तभी मास्टर भाई रामगोपाल यादव का पर्चा भरा दिया।

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अब इसको मुलायम सिंह की दूर दर्शिता ही कहा जा सकता है, कि अपने राजनैतिक गुरु के विरूद्ध जाकर अपने भाई को मैदान में उतार दिया, न केवल उतारा बल्कि जीता भी दिया। बस यंही से तस्वीर साफ़ हो गई कि दोनों के बीच का मेल ज्यादा दिन नहीं चलने बाला। और हुआ भी कुछ ऐसा ही।

साल 1992 में मुलायम सिंह ने पासा फेंका और समाजबादी जनता पार्टी से अलग होते हुए समाजबादी पार्टी का ऐलान कर दिया। हालांकि, तब ज्यादातर दलों ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया था। पर आगे…

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राजनीतिक दांव-पेंच के माहिर मुलायम सिंह बहुजन समाज पार्टी के साथ दोस्ती कर 1993 में फिर से राज्य के मुख्यमंत्री बन गए। मायावती और मुलायम का गठबंधन दो साल बाद ही 1995 में तल्ख और भारी कड़वाहट भरे रिश्तों के साथ टूट गया।

इसके बाद बीजेपी के सहयोग से मायावती यूपी की मुख्यमंत्री बनीं। 2003 में यादव ने एक बार फिर सियासी अखाड़े का धोबी पछाड़ दांव चला और मायावती को अपदस्थ कर दिया। एक साल पहले ही 2002 के चुनावों में मायावती ने बीजेपी के सहयोग से कुर्सी पाई थी लेकिन बीजेपी ने उनसे अपना समर्थन वापस ले लिया।

नेता से पहले थे पहलवान

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मुलायम सिंह यादव सियासी अखाड़े के दाव-पेच तो बखूबी जानते ही है लेकिन साथ ही जमीनी अखाड़े में भी बह दो-दो हाँथ कर चुके है। सियासत के अखाड़े में आने से पहले वह पहलवान थे। फिर अध्यापन में आए और 60 के दशक में राजनीति में एंट्री ली। मुलायम ने यूपी के आगरा विवि से एमए और जैन इंटर कॉलेज से बीटीसी किया था।

भैंसा गाड़ी से गई थी बारात

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मीडिया खबरों के अनुसार, मुलायम सिंह यादव का राजनितिक सफर जितना दिलचस्प रहा उतना ही उनका निजी जीवन भी मीडिया की सुर्खियों से अछूता नहीं रह सका। मीडिया खबरों के अनुसार, पहली शादी 18 साल की उम्र में कर दी गई थी। वह तब 10वीं में थे। बताया जाता है कि तब मुलायम की बारात भैंसा गाड़ी से गई थी, क्योंकि तब मोटर कारों का इतना चलन नहीं था।

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