फाइजर, मॉडर्ना या स्पुतिनक, जानें कौन सी वैक्सीन भारत के लिए है सबसे बेहतर

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कोरोना वायरस एक बार फिर पूरी दुनिया को डराने लगा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन- WHO ने कहा है कि अब कोरोना की तीसरी लहर आ रही है और जानकार कह रहे हैं कि ये लहर. आपको बता दें कि सुनामी से भी ज्यादा खतरनाक हो सकती है. देश के ढेरों लोग अपने आसपास जिस तरह से कोरोना के नए केस आते देख रहे हैं. उसने हर किसी की फिक्र बढ़ा दी है. इस फिक्र पर थोड़ी सी लगाम तब लग सकती है. जब या तो कोरोना की दवा आ जाए या फिर वैक्सीन आ जाए. फिलहाल जिस तरह विज्ञान आगे बढ़ रहा है पहले कोरोना की वैक्सीन ही आने की उम्मीद की जा रही है. दावा किया जा रहा है कि मार्च तक भारत में भी वैक्सीन आ जाएगी. लेकिन उससे बड़ा सवाल ये है कि ये वैक्सीन आपको कब मिलेगी. इसकी पड़ताल पर जाने से पहले आपको कुछ आंकड़े देखने चाहिए.

बता दें कि इस वक्त पूरी दुनिया में भारत की बात करें तो संक्रमण के लिहाज से हमारा देश दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा प्रभावित देश हैं. सवा करोड़ से ज्यादा मामलों के साथ अमेरिका नंबर वन है. जबकि भारत साढ़े 91 लाख से ज्यादा मामलों के साथ दूसरे नंबर पर है और ब्राजील तीसरे नंबर पर है.

मौत के आंकड़े देखे जाएं, तब भी भारत कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित टॉप थ्री देशो में है. अब तक एक लाख तैंतीस हजार से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और हर दिन ये आंकड़ा बढ़ता जा रहा है और कब रुकेगा ये कहना मुश्किल है. ‘इसलिए जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं’ इस मंत्र को पकड़कर चल रहे भारत की सांसें अटकी हुई हैं और उम्मीदें टिकी हुई हैं कोरोना के टीके पर, क्योंकि कोरोना का टीका ही चीन से निकले वायरस से फैली महामारी पर विराम लगा सकता है.

इसलिए वैक्सीन और कोरोना के हालात पर चर्चा के लिए मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक मीटिंग करेंगे, जिसमें सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री होंगे. खास बात ये है कि इस बैठक में वैक्सीन वितरण को लेकर चर्चा हो सकती है. प्रधानमंत्री मंगलवार को लगातार दो बैठकें कर सकते हैं. पहली बैठक मौजूदा समय में कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ हो सकती है.

आपको बता दें कि ये मीटिंग इसलिए बेहद अहम है, क्योंकि खबर है कि जनवरी के अंत या फरवरी की शुरुआत में देश को ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका वैक्सीन का पहला लॉट मिल सकता है. लेकिन उसकी आप तक पहुंचने की रफ्तार क्या होगी, इसे देखिए इस रिपोर्ट में.

कोरोना वायरस से मुक्ति दिलाने वाली संजीवनी यानि वैक्सीन पर पूरी दुनिया की नजर है और दुनिया भर के वैज्ञानिक पिछले एक साल से दिन रात वैक्सीन बनाने में लगे हैं. 200 से ज्यादा कंपनियां वैक्सीन बनाने में जुटी हैं. लेकिन अभी ज्यादा उम्मीद सिर्फ कुछ कंपनियों की वैक्सीन से ही है.

कब तक आ सकती वैक्सीन

आपको बता दें कि फाइजर-बायोएनटेक की कोरोनावायरस वैक्सीन अगले महीने यानी दिसंबर तक लोगों की लगनी शुरू हो सकती है. मॉडर्ना की कोरोना वैक्सीन भी दिसंबर के आखिर तक आ सकती है. ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन को अगर इमर्जेंसी अप्रूवल मिलता है, तो ये दिसंबर में आ सकती है. स्वदेशी को-वैक्सीन भी अंतिम ट्रायल में है और अगले साल फरवरी-मार्च तक आ सकती है. रूस की वैक्सीन स्पुतिनक रूस समेत कुछ देशों में सावधानी के साथ आम जनता को दी जाने लगी है.

इस बीच अमेरिका से एक गुड न्यूज आई है. व्हाइट हाउस की ओर से बताया गया है कि अमेरिका में 11 या 12 दिसंबर से Covid-19 टीकाकरण शुरू हो सकता है. FDA फाइजर-बायोएनटेक की वैक्सीन के इमरजेंसी यूज की इजाजत दे सकता है. तो भारत में भी अगले 1-2 महीने बाद वैक्सीन की उम्मीद है.

बता दें कि इस वक्त भारत बायोटेक-ICMR की वैक्सीन COVAXINE तीसरे चरण के ट्रायल में है. ये पूर्ण रूप से स्वदेशी वैक्सीन है. मल्टीनेशनल फार्मा कंपनी Zydus Cadila की कोरोना वैक्सीन ZyCov-D का ट्रायल दूसरे चरण में है इसके तीसरे चरण का ट्रायल अभी बाकी है.

सीरम इंस्टीट्यूट ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राजेनेका के साथ मिलकर कोविशील्ड तैयार कर रही है. दिसंबर तक उसकी वैक्सीन को मंजूरी मिल जाएगी. रूस में बनी कोरोना वैक्सीन स्पूतनिक का भी जल्द ही ट्रायल शुरू होगा. लेकिन भारत को सबसे ज्यादा उम्मीदें ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन कोविशील्ड से है, जिसे सीरम इंस्टीट्यूट तैयार कर रहा है. ऐसा क्यों है, अब आप वो समझ लीजिए.

अगले महीने जो वैक्सीन आने की उम्मीदें हैं…उनमें ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की कोविशील्ड के अलावा फाइजर-बायोएनटेक और मॉडर्ना की वैक्सीन हैं. फाइजर की वैक्सीन 95 प्रतिशत और मॉडर्ना की वैक्सीन 94.5 प्रतिशत प्रभावी होने का दावा है. जबकि अंतिम ट्रायल में ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की कोविशील्ड की पहली डोज आधी और दूसरी डोज पूरी देने पर 90 प्रतिशत तक असरदार रही.

कितनी होगी कीमत

नाम और काम के बाद दाम के लिहाज से भी ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन भारत के लिए बिल्कुल मुफीद है. मॉडर्ना की वैक्सीन की कीमत 1850 से 2750 रुपये के बीच होगी. फाइजर का टीका 4150 रुपये का पड़ेगा, जबकि सूत्रों के मुताबिक ऑक्सफोर्ड-एस्ट्रोजेनेका का कोविशील्ड 500 से 600 रुपये में मिल जाएगा और भारत में सबसे पहले इसी टीके के आने की उम्मीद है. ऐसा इसलिए, क्योंकि ब्रिटेन में एस्ट्राजेनेका इसके इमर्जेंसी अप्रूवल के लिए अप्लाई करेगी और वहां मंजूरी मिलते ही सीरम इंस्टिट्यूट उसी ट्रायल डेटा को आधार बनाकर भारत में इमर्जेंसी अप्रूवल के लिए अप्लाई करेगा.

वैक्सीन स्टोर में क्या है दिक्कत

ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन कोविशील्ड भारत के लिए बेहतर माने जाने की एक और बड़ी वजह है और वो है इसे स्टोर करने के लिए जरूरी तापमान. भारत में वैक्सीन को लेकर सबसे बड़ी चिंता यही है कि उसे स्टोर और डिस्ट्रीब्यूट कैसे किया जाएगा. इस लिहाज से मॉडर्ना और फाइजर की वैक्सीन के मुकाबले कोविशील्ड भारत में ज्यादा कारगर साबित होगी.

क्योंकि फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीन को शून्य से भी काफी कम तापमान पर रखना पड़ता है. फाइजर की वैक्सीन माइनस 70 डिग्री में रखनी पड़ेगी. तो मॉडर्ना की वैक्सीन को स्टोर करने के लिए माइनस 20 डिग्री तापमान में रखना होगा. जबकि इनके मुकाबले ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की कोविशील्ड का टीका 2 से 8 डिग्री तापमान पर स्टोर किया जा सकता है और भारत में राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान के तहत पोलियो और रोटावायरस वैक्सीन को छोड़कर सभी वैक्सीन इसी तापमान पर स्टोर की जाती हैं.

बता दें कि उस हिसाब से यानी 2 से 8 डिग्री तापमान के लिए भारत के पास मौजूद कोल्ड चेन का नेटवर्क है. इसके लिए देश में 27 हजार से ज्यादा कोल्ड चेन प्वाइंट्स हैं और इस लिहाज से ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन एकदम परफेक्ट है. लेकिन भारत सिर्फ ऑक्सफोर्ड एस्ट्राजेनेका वैक्सीन के भरोसे ही नहीं बैठा है.

किन देशों ने की डील

दुनिया भर में बन रही वैक्सीन में भारत अब तक 150 करोड़ से अधिक डोज की डील कर चुका है. जबकि यूरोपीय यूनियन ने 120 करोड़ डोज और अमेरिका ने 100 करोड़ डोज की डील की है. लेकिन फिलहाल सरकार का फोकस ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन पर है. सरकार का लक्ष्य जुलाई तक 25 करोड़ लोगों को कोरोना वैक्सीन की डोज देने का है. हर शख्स को वैक्सीन की दो डोज की जरूरत पड़ेगी, तो उस हिसाब से जुलाई तक भारत को कम से कम 50 करोड़ डोज चाहिए होंगी. सीरम इंस्टीट्यूट के मुताबिक जनवरी से वो हर महीने 5-6 करोड़ डोज का उत्पादन शुरू कर देगा. इस हिसाब से 25 करोड़ लोगों के लिए 50 करोड़ डोज बनाने में करीब 10 महीने का वक्त लग जाएगा. इससे आप समझ सकते हैं कि 130 करोड़ लोगों तक टीका पहुंचने में कितना वक्त लगेगा.

तो साफ है कि कोरोना की वैक्सीन मिलने के बाद उसे सब लोगों तक पहुंचना और लगाना बहुत मुश्किल काम होगा. हालांकि भारत के लिए ये बाकी दुनिया जितना मुश्किल नहीं है. क्योंकि हमारे यहां दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम चलता है और पोलिया का टीकाकरण पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है. इससे भारत को आसानी तो होगी, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि मुश्किल नहीं होगी. क्योंकि बच्चों का टीकाकरण और पूरी 130 करोड़ से भी ज्यादा आबादी का टीकाकरण करने में फर्क है और ये फर्क कितना बड़ा है, इसका सरकार को अहसास है और इसीलिए पूरा खाका खींचा जा रहा है.

इसके तहत सबसे पहले देश के 1 करोड़ से ज्यादा हेल्थ वर्कर्स को कोरोना का टीका लगाया जाएगा. इनमें डॉक्टर, नर्स और आशा कार्यकर्ता के अलावा MBBS के छात्र भी शामिल होंगे. दूसरे ग्रुप में कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहे 2 करोड़ फ्रंटलाइन वर्कर्स को वैक्सीन दी जाएगी. इसमें नगर निगमकर्मी, पुलिसकर्मी और सशस्त्र बलों से संबंधित कर्मी शामिल होंगे. इसके बाद 50 साल से अधिक उम्र के 26 करोड़ लोगों को वैक्सीन दी जाएगी, क्योंकि उनमें कोरोना संक्रमण का खतरा सबसे ज्यादा है.

लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि लोग बेफिक्र हो जाएं कि वैक्सीन आने वाली है और उन्हें मिलने वाली है. क्योंकि इसमें अभी कम से कम 10 महीने का वक्त लगेगा और तब तक सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है.

दिल्लीवालों ने लापरवाही की इंतेहा कर दी है. हालात एक बार फिर बिगड़ रहे हैं, लेकिन लोग हैं कि मान नहीं रहे. देश की राजधानी दिल्ली जितनी बड़ी है. उससे कहीं ज्यादा बड़ी है यहां सार्वजनिक स्थलों पर बरती जा रही लापरवाही.

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